
भारत विविधताओं का देश है! भाषा, संस्कृति, परंपरा और विचारों की अनगिनत रूपों में बँधा। लेकिन इसी विविधता के बीच हमारी भाषा नीति में अंधकार और आलस्य की छाया है। हिंदी, जो करोड़ों भारतीयों की सोच, बोलचाल और जीवन की भाषा है, वह आज केवल औपचारिक सम्मान की वस्तु बनकर रह गई है। हिंदी दिवस का पर्व अब केवल ढोल-नगाड़ों, समारोहों और पोथियों तक सीमित रह गया है। सवाल यही है कि क्या हमारी न्याय-व्यवस्था, शासन और लोकतंत्र जनता की भाषा में काम कर रहे हैं ? जवाब एकदम स्पष्ट है—नहीं।
आज भी सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा अंग्रेज़ी है। निर्णय, आदेश, दस्तावेज सब अंग्रेज़ी में। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, यह लोकतंत्र पर तमाचा है। आम आदमी, जो दशकों तक मुकदमे लड़ता है, वह अंतिम निर्णय तक पढ़ नहीं सकता। न्याय, जो समझ से परे हो, वह केवल आदेश बनकर रह जाता है। अंग्रेजी एक प्रकार से लोकतंत्र की दीवार बन कर रह गई है।
निचली अदालतों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग होता है, लेकिन उच्च न्यायालय में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता न्याय और नागरिक के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देती है। यही दीवार लोकतंत्र की आत्मा में दरार डालती है। संविधान ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया, लेकिन व्यवहार में अंग्रेज़ी सत्ता, अवसर और शक्ति की भाषा बन चुकी है।
लोहिया जी कहते थे *“जिस समाज में जनता की भाषा सत्ता की भाषा नहीं होती, वहाँ लोकतंत्र केवल नाम का रह जाता है।”* यही कारण है कि न्याय का अधिकार आम आदमी तक पहुँचने के बजाय केवल कागज़ों और कार्यालयों तक सीमित रह गया है।
विडंबना देखिए कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ ने मान्यता दी। UNO के आधिकारिक हिंदी ट्विटर/X हैंडल @UN_Hindi वैश्विक स्तर पर हिंदी में संवाद करता है। लेकिन भारत में, जहाँ हिंदी सबसे अधिक बोली और समझी जाती है, उसे राष्ट्रभाषा का औपचारिक दर्जा क्यों नहीं मिला? यह केवल प्रशासनिक आलस्य नहीं, यह राजनीतिक और नैतिक कमजोरी है। हिंदी विश्व के पटल पर पहुंच गई लेकिन आज भी भारत में उपेक्षित है।
लोहिया जी ने पहले ही चेतावनी देते हुए कहा था कि *“अंग्रेज़ी भारत में गरीबों को चुप कराने की सबसे कारगर भाषा है।”* यही कारण है कि हमारी न्याय-व्यवस्था और प्रशासन जनता से दूर और अपठनीय बन चुके हैं।
समाजवादी आंदोलन के महानायक लोक नायक जयप्रकाश नारायण, मधु लिमये, जॉर्ज फ़र्नांडिस, बीजू पटनायक मुलायम सिंह यादव आदि समाजवादी लोगों ने संसद से सड़क तक हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर दिया। लेकिन आज के समाजवादी नेता और विचारक अंग्रेज़ीदां बनते जा रहे हैं। उनके लेख, किताबें और संवाद अंग्रेज़ी में होते हैं।
लोहिया जी कहते थे कि *“मैं हिंदी इसलिए नहीं चाहता कि वह किसी पर थोप दी जाए, बल्कि इसलिए चाहता हूँ कि सत्ता जनता की भाषा में आए।”* परंतु आज के समाजवादी लेखक और नेता इस मूल सिद्धांत से दूर होते जा रहे हैं। यह केवल भाषा का परित्याग नहीं, बल्कि जनता से दूरी और राजनीतिक ईमानदारी पर चोट है।
मैं किसी भाषा का विरोध नहीं करता संवाद और विचार प्रवाह के लिए हर भाषा महत्वपूर्ण है। लेकिन हिंदी, जो करोड़ों भारतीयों की आत्मा और लोकतंत्र की रीढ़ है, उसे केंद्र में रखा जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश आम नागरिक के लिए अपठनीय हैं। जब न्याय समझ में नहीं आता, वह केवल कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। न्याय केवल आदेश नहीं, विश्वास का विषय है। लोकतंत्र तब ही मजबूत होगा, जब जनता का न्याय जनता की भाषा में पहुँचे।
लोहिया जी ने स्पष्ट कहा था कि *“समाजवाद बिना भाषायी बराबरी के अधूरा है।”* यही संदेश न्यायपालिका और प्रशासन के लिए भी लागू होता है। जब तक न्याय और सत्ता जनता की भाषा में नहीं होंगे, समाजवाद और लोकतंत्र केवल शब्दों में ही मौजूद रहेंगे।
आज तकनीक द्विभाषी और बहुभाषी निर्णयों को संभव बनाती है। न्यायपालिका, प्रशासन और शिक्षा की भाषा जनता की होनी चाहिए। उच्च न्यायालय में द्विभाषी निर्णय, न्यायिक शिक्षा में भारतीय भाषाओं का अधिक प्रयोग, आधुनिक तकनीक और अनुवाद यह सब संभव है। लेकिन इसके लिए राजनीतिक साहस और संस्थागत प्रतिबद्धता चाहिए।
लोहिया जी की सीख को याद करें: *“जिस समाज में जनता की भाषा को महत्व नहीं दिया जाता, वह समाज केवल नाम का लोकतंत्र है।”*
हिंदी दिवस का संदेश यही है कि जब तक सत्ता, शिक्षा और न्याय जनता की भाषा में नहीं होंगे, लोकतंत्र अधूरा रहेगा। यह केवल औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि संघर्ष और संकल्प का दिन है। हिंदी केवल भाषणों की भाषा नहीं, बल्कि लोकतंत्र और न्याय की जीवंत भाषा बननी चाहिए। भाषा का प्रश्न दरअसल इंसाफ़ और इज़्ज़त का प्रश्न है।समाजवादी नेता और लेखकों को याद रखना चाहिए कि जनता से दूरी और अंग्रेज़ी प्रेम केवल भाषायी आत्महत्या है। हिंदी को केंद्र में लाना ही सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और सत्ता के असली चेहरे की पहचान है और यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।


