
विशेष—–
महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने की थी, यह इतिहास का निर्विवाद तथ्य है। लेकिन गांधी के जीवन की कहानी केवल उनकी हत्या पर समाप्त नहीं होती। उसी इतिहास में एक और नाम दर्ज है, जो उतना ही सच्चा है, भले ही उतना प्रसिद्ध नहीं रहा बतख मियां अंसारी। गोडसे ने गांधी को मारा, लेकिन बतख मियां ने गांधी को बचाया था। एक ने मृत्यु दी, दूसरे ने जीवन। यह फर्क केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो नैतिक धाराओं के बीच का फर्क है।
गांधी के जीवन पर उन्हें मारने के लिए कम से कम छह बड़े प्रयास हुए। छठी बार जाकर हत्यारे सफल हुए। लेकिन इससे बहुत पहले, 1917 में बिहार के चंपारण में दो बार उनकी हत्या की साज़िश रची गई थी। इन्हीं में से एक साज़िश को एक ग़रीब, अनाम घरेलू नौकर बतख मियां अंसारी ने नाकाम कर दिया। यह वही दौर था जब गांधी नील किसानों के शोषण के खिलाफ चंपारण सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहे थे। तिनकठिया प्रथा के तहत किसान अपनी ज़मीन पर जबरन नील उगाने को मजबूर थे। यह गांधी के राजनीतिक जीवन का शुरुआती समय था और चंपारण वही पड़ाव था, जहाँ से उनकी पहचान एक राष्ट्रीय नैतिक शक्ति के रूप में बनने लगी।
गांधी की बढ़ती लोकप्रियता से नील फैक्ट्रियों के अंग्रेज़ मैनेजर घबरा गए थे। मोतिहारी में नील फैक्ट्री मालिकों के नेता इरविन ने गांधी को बातचीत के बहाने बुलाया और वहीं उनकी हत्या की योजना बनाई। योजना यह थी कि खाने पीने के वस्तुओं में ऐसा ज़हर मिलाया जाए जिसका असर देर से हो, ताकि गांधी वहाँ से निकल जाएँ और मौत बाद में हो। इससे हत्या का शक सीधे इरविन पर न आए और अंग्रेज़ी सत्ता के लिए रास्ता आसान हो जाए।
इरविन के घर में घरेलू नौकर थे बतख मियां अंसारी। एक साधारण, ग़रीब आदमी छोटा सा परिवार, रोज़ी-रोटी का एकमात्र सहारा वही नौकरी। उन्हें पूरी साज़िश समझाई गई। लालच भी दिया गया और धमकी भी। कहा गया कि वही दूध का गिलास लेकर गांधी के पास जाएँगे। बतख मियां मालिक का आदेश टाल नहीं पाए और दूध से भरा गिलास लेकर गांधी के सामने पहुँचे।
लेकिन वहीं, उस निर्णायक क्षण में, एक ग़रीब इंसान का ज़मीर जाग उठा। वे उसे आगे नहीं बढ़ा सके। ठिठक गए उनके हाथ कांपने लगे,गांधी ने सिर उठाकर देखा तो बतख मियां रो पड़े। गांधी ने कारण पूछा। बतख मियां ने सारी साज़िश बता दी। इसी एक सच ने हत्या की योजना को नाकाम कर दिया। एक अनाम आदमी के नैतिक साहस ने न केवल गांधी के प्राण बचाए, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की नैतिक आत्मा को भी सुरक्षित रखा।
इस साहस की कीमत बहुत भारी थी। अंग्रेज़ हुकूमत और नीलहों के लिए यह “ग़द्दारी” अक्षम्य थी। बतख मियां को जेल में डाल दिया गया। उनका घर ढहा दिया गया और वहाँ कब्रिस्तान बना दिया गया। उनकी थोड़ी-सी ज़मीन नीलाम कर दी गई। परिवार पर जुल्म हुए, जीवन तबाह हो गया। बतख मियां चाहें तो माफी मांग सकते थे, समझौता कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बताया जाता है कि उन्होंने लगभग 17 वर्ष अपनी ज़िंदगी जेल में गुज़ार दी। गांधी को बचाने की यह कीमत उन्होंने बिना किसी पुरस्कार या पहचान की अपेक्षा के चुकाई।
1917 में बतख मियां ने गांधी को बचा लिया था। 1948 में गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी। कहा जाता है कि चंपारण की उस घटना के समय गांधी के साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी मौजूद थे, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बने। 1957 में, जब राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मोतिहारी पहुँचे और एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे, तो उनकी नज़र भीड़ में एक व्यक्ति पर पड़ी जो आगे आने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने पहचान लिया और पुकारा “बतख भाई, कैसे हो?” बतख मियां को मंच पर बुलाया गया, गले लगाया गया और पूरी सभा के सामने गांधी की हत्या की साज़िश को नाकाम करने की कहानी सुनाई गई।
सभा के बाद राष्ट्रपति बतख मियां को अपने साथ ले गए। बतख मियां ने अपनी बर्बादी का किस्सा सुनाया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उनके बेटे जान मियां को कुछ समय के लिए राष्ट्रपति भवन में भी रखा। यह भी दर्ज है कि उन्होंने आदेश दिया था कि बतख मियां के परिवार को 35 एकड़ ज़मीन दी जाए, लेकिन कई स्रोत बताते हैं कि यह आदेश काग़ज़ों से आगे नहीं बढ़ सका।
आज विडंबना यह है कि गांधी के जीवनदाता बतख मियां अंसारी का परिवार अभाव में जीवन जी रहा है। रहने के लिए पक्का मकान तक नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार हर स्तर पर संघर्ष। सरकारी योजनाएँ उनके लिए सिर्फ़ घोषणाएँ बनकर रह गई हैं। यह हाल उस परिवार का है, जिसने राष्ट्रपिता के प्राण बचाने की कीमत अपनी पूरी ज़िंदगी से चुकाई।
यह प्रश्न सिर्फ़ एक परिवार का नहीं है, बल्कि हमारी राष्ट्रीय स्मृति और नैतिक ज़िम्मेदारी का है। हम हत्यारों के नाम जानते हैं, लेकिन जीवन बचाने वालों को भूल जाते हैं। आज़ादी केवल बड़े नेताओं से नहीं मिली, बल्कि बतख मियां जैसे ग़रीब, गुमनाम लोगों के त्याग और साहस से मिली। सरकार और बौद्धिक समाज दोनों का दायित्व है कि वे संज्ञान लें, बतख मियां अंसारी की विरासत को सम्मान दें और उनके परिजनों को वह अधिकार और गरिमा दिलाएँ, जिसके वे हक़दार हैं। क्योंकि राष्ट्र सिर्फ़ स्मारकों से नहीं बनता, राष्ट्र बनता है उन अनाम लोगों की क़ुर्बानियों से, जिन्हें याद रखना हमारा नैतिक फ़र्ज़ है।




