
शब-ए-बरात (शुभ रात)
क़ुरआन और हदीस की रोशनी में एक लेख
इस्लामी कैलेंडर के अनुसार शाबान माह की 15वीं रात को शब-ए-बरात कहा जाता है।
अरबी में “शब” का अर्थ है रात और “बरात” का अर्थ है मुक्ति, छुटकारा या फैसला।
यह वह मुबारक रात है जिसमें अल्लाह तआला अपने बंदों के लिए आने वाले साल के फैसले फरमाते हैं,
गुनाहों की माफी देते हैं और अपनी रहमतों के दरवाज़े खोल देते हैं। क़ुरआन की रोशनी में शब-ए-बरात
अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-मजीद में फ़रमाते हैं:
“हमने इस (क़ुरआन) को एक बरकत वाली रात में उतारा,
बेशक हम डर सुनाने वाले हैं।
उसी रात में हर हिकमत वाला मामला तय किया जाता है।”
(सूरह अद-दुख़ान 44:3–4)
कई मुफस्सिरीन के अनुसार इस आयत में जिस “बरकत वाली रात” का ज़िक्र है,
उससे मुराद शब-ए-बरात है।
इस रात में अगले एक साल तक के
रिज़्क़, ज़िंदगी, मौत, सेहत, बीमारी और हालात के फैसले लिखे जाते हैं।
हदीस की रोशनी में शब-ए-बरात
हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया:
“शाबान की पंद्रहवीं रात अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल फरमा होता है।
और बनी कल्ब की बकरियों के बालों से भी ज़्यादा लोगों की मग़फ़िरत फरमाता है।
एक दूसरी हदीस में आता है:
“इस रात अल्लाह तआला सबकी मग़फ़िरत फरमाता है।
सिवाय उस शख़्स के जो शिर्क करता हो
या जिसके दिल में किसी के लिए दुश्मनी हो।”
यह हदीस बताती है कि यह रात
माफी, रहमत और तौबा की रात है।
✨ शब-ए-बरात क्यों खास है?
इस रात:
• बंदों के आमाल अल्लाह के सामने पेश किए जाते हैं
• तक़दीर के फैसले लिखे जाते हैं
• गुनाहों की माफी का सुनहरा मौका मिलता है
• मरहूमीन के लिए की गई दुआ कुबूल होती है
इसी वजह से इसे “नजात की रात” भी कहा जाता है।
🤲 शब-ए-बरात में क्या करना चाहिए?
• नफ़्ल नमाज़ अदा करना
• क़ुरआन की तिलावत करना
• दिल से तौबा और इस्तिग़फ़ार करना
• अपने लिए और पूरी उम्मत के लिए दुआ करना
• माता-पिता और मरहूमीन के लिए दुआ करना
• अगले दिन रोज़ा रखना
किन बातों से बचना चाहिए?
• आतिशबाज़ी
• दिखावा और फिज़ूल काम
• गलत रस्में और बिदअत
• शिर्क
• दिल में नफरत और बैर रखना
शब-ए-बरात की असल रूह इबादत,
खामोशी और इख़लास में है।
आज की रात मुबारक रात है।
यह सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि अपने गुनाहों पर ठहरकर सोचने, अपने रब के सामने झुकने और उन रूहों को याद करने की रात है जो हमसे जुदा हो चुकी हैं। दुआ है कि यह रात हमारे दिलों को नरम करे, नीयतों को साफ़ करे और समाज में इंसानियत, सब्र और मोहब्बत को मज़बूती दे। अल्लाह हम सबकी दुआएँ क़बूल फ़रमाए।

