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*मुस्लिम समाज की राजनीतिक कमजोरी और आपसी फूट: एक कड़वी सच्चाई* –निसार अहमद

दिमागों को झकझोरता निसार अहमद का लेख

भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य में मुस्लिम समाज हमेशा एक महत्वपूर्ण वोट बैंक रहा है। लेकिन दुर्भाग्यवश, समाज के भीतर आपसी फूट और राजनीतिक समझ की कमी ने इसे हर मोड़ पर कमजोर कर दिया है। यह सिर्फ समाज की अंदरूनी लड़ाइयों का परिणाम नहीं है, बल्कि बाहरी राजनीतिक दलों की रणनीतियों का भी नतीजा है।
एक कड़वी सच्चाई यह है कि अधिकांश सेकुलर और कथित प्रगतिशील पार्टियां—जैसे कांग्रेस, सपा, बसपा आदि—मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अपने दल की ओर से ही मुस्लिम उम्मीदवार खड़े करती हैं। सुनने में यह सही लगता है, लेकिन असलियत में यह रणनीति अक्सर समाज के हित में नहीं होती। इन उम्मीदवारों का चयन कभी-कभी योग्यता, अनुभव और समाज की वास्तविक जरूरतों के बजाय दलगत गणित पर आधारित होता है। नतीजतन, चुनाव में मुस्लिम समाज का उम्मीदवार हार जाता है, और समाज की राजनीतिक उपस्थिति और प्रतिनिधित्व कम हो जाता है।
इस प्रक्रिया से समाज की असली ताकत कमजोर होती है। राजनीतिक सलाहियत और नेतृत्व क्षमता के मामले में मुस्लिम समाज अभी भी पीछे है। लेकिन एक और कड़वी सच्चाई यह भी है कि वफादारी के मामले में यह समाज सबसे आगे है। जिस भी दल या नेता के साथ यह समाज जुड़ता है, उसके लिए समाज हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार दिखाई देता है। इस वफादारी का फायदा अक्सर बाहरी दलों को होता है, समाज को नहीं।
आपसी वर्चस्व की लड़ाई, जातीय या धार्मिक भेदभाव और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने मुस्लिम समाज को भीतर से कमजोर कर दिया है। समाज में शिक्षा, रोजगार, स्वरोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दे अक्सर चुनावी मोह और बाहरी दलों के वादों के पीछे दब जाते हैं। नतीजतन, समाज अपनी वास्तविक शक्ति पहचान नहीं पाता और हर चुनावी मोड़ पर केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होता है।
समाज की मजबूती तभी संभव है जब यह अपने अंदरूनी मतभेदों को दरकिनार कर एकजुट हो। सिर्फ वफादारी और बाहरी दलों के भरोसे रहने से कोई विकास संभव नहीं है। राजनीतिक जागरूकता, नेतृत्व प्रशिक्षण, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम से ही मुस्लिम समाज अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
निष्कर्ष:
मुस्लिम समाज में आपसी फूट और बाहरी दलों के राजनीतिक खेल ने इसे लगातार कमजोर किया है। समाज अपनी वफादारी में सबसे आगे है, लेकिन राजनीतिक सलाहियत में पीछे है। अगर मुस्लिम समाज अपने भीतर के नेतृत्व और सामूहिक शक्ति को पहचान ले, आपसी मतभेदों को खत्म करे और अपने वास्तविक हितों के लिए संघर्ष करे, तो वह न केवल अपने समुदाय के लिए, बल्कि देश की राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है

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