
साहित्य
उर्दू अदब की दुनिया के लिये आज का दिन एक बेहद दुखद है।
मोहब्बत, इंसानियत और रिश्तों को बेहद सादगी और गहराई से बयान करने वाले
मशहूर शायर व ग़ज़लकार ताहिर फ़राज़ साहब अब हमारे बीच नहीं रहे।
उनका इंतेक़ाल उर्दू शायरी के लिए एक बड़ा नुकसान है।
ताहिर फ़राज़ साहब की पहचान सिर्फ़ इश्क़ की शायरी तक सीमित नहीं थी।
उन्होंने “माई / माँ” जैसे पाक और मुक़द्दस रिश्ते पर भी
इतनी ख़ूबसूरत, सच्ची और दिल को छू लेने वाली ग़ज़लें लिखीं
कि हर सुनने वाला अपनी माँ को याद किए बिना नहीं रह पाता था।
उनकी शायरी में माँ सिर्फ़ एक किरदार नहीं,
बल्कि दुआ, साया और जन्नत का एहसास बनकर सामने आती थी।
“कभी मैं जो कह दूँ, मोहब्बत है तुम से,
तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना,
कि मेरी ज़रूरत हो तुम,
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम।”
चाहे मोहब्बत हो या “माई” की ममता —
ताहिर फ़राज़ साहब ने अल्फ़ाज़ को एहसास बना दिया।
ऐसे शायर कभी फ़न से जुदा नहीं होते,
वह अपनी तहरीरों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
अल्लाह तआला से दुआ है कि
ताहिर फ़राज़ साहब की आत्मा को शांति अता फ़रमाए
और उनके परिवार व चाहने वालों को यह दुख सहने की हिम्मत दे।
आप गए नहीं हैं साहब,
आप अपनी शायरी में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।




